यह एक कहानी है एक लड़के की, या फिर मेरी नहीं, लेखक कहना सही होगा। हाँ, "लेखक" शब्द अच्छा लगता है, किसी को पता नहीं चलेगा कि यह कहानी किसकी है, लेकिन जिस जगह की यह कहानी है, वहाँ के लोग शायद जान जाएं। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
तो ऐसे में मैं यह सब लिखता रहूंगा। अब मैं, यानी लेखक, यानी वो लड़का... ये क्या सस्पेंस दे रहा हूँ? अरे नहीं, क्या बात कर रहा हूँ, "यार, मैं खुद से ही बात करता रहता हूँ।" आइए, मैं बताता हूँ उस लेखक के बारे में, यानी मैं खुद।
तो अब... मेरा नाम, अरे नहीं, अपना नाम नहीं लिखना है, नाम की जगह "लेखक" लिखना है। ठीक है भाई! क्या बात है, मैं खुद को भाई कह रहा हूँ।
तो मैं लेखक, बात उस समय की है जब समय था...लगभग मुझे याद नहीं, लेकिन मैं बताता हूँ, यह बात सन 2005 की है। उस समय मेरी उम्र लगभग 6 साल रही होगी। हमारा सरकारी स्कूल हमारे घर से बहुत दूर था, और हाँ, दूर तो अब भी है, बच्चों के लिए।
हमारे घर से थोड़ी दूर एक गाँव था। उस गाँव में एक बाबा रहते थे। मतलब अब वो बाबा नहीं हैं। वह गाँव के बच्चों को पढ़ाया करते थे। जिन्होंने बाबा से शिक्षा ली, वो आगे चलकर बहुत विद्वान निकले।
लेकिन मैंने बाबा के बारे में कुछ बताया ही नहीं। लो भाई, अब बताता हूँ।
बाबा, जिनका नाम भगवानदीन था, हम उन्हें प्यार से बाबादीन बुलाते थे। लेकिन हाँ, बाबा बड़े खडूस थे। वह मुझे बहुत मारते थे। एक दिन जब मैं स्कूल नहीं गया, तो उन्होंने चार बच्चों को भेजा और कहा,
"जाओ उस गधे को लेकर आओ।"
वो चारों बच्चे मुझे ढूंढने निकल पड़े। उन्होंने मुझे ढूंढा और बोरा (जूट के बोरों में जो चीजें लाते हैं) में डालकर घसीटते हुए बाबा के पास ले आए। अभी भी उन चारों पर गुस्सा आ रहा है, लेकिन क्या करें, अब वो हमसे बड़े थे।
चारों बच्चों ने मुझे बोरे में डालकर बाबा के पास घसीटते हुए लाया था। मुझे तो ऐसा लगा जैसे मैं कोई आलू-प्याज हूं, जिसे मंडी से लाया जा रहा हो। लेकिन उस वक्त डर, गुस्सा और बेबसी इतनी ज्यादा थी कि मैं चिल्ला भी नहीं पाया।
जब मैं बाबा के पास पहुँचा, तो उन्होंने एक नजर मुझ पर डाली और उनके चेहरे पर वही हमेशा वाला खडूसपन उभर आया। बाबा ने मुझे बोरे से बाहर निकाला और मेरे कपड़ों की तरफ देखा। स्कूल यूनिफॉर्म में होने के बावजूद बाबा को पता था कि मैं स्कूल नहीं गया था। उनकी नजरों से ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने मेरे दिमाग के अंदर झाँक लिया हो और सारा सच जान लिया हो।
"क्यों रे, स्कूल क्यों नहीं गया?" बाबा की गहरी आवाज गूँजी।
मैंने धीरे से जवाब दिया, "बाबा, तबियत ठीक नहीं थी।" हालाँकि, यह सिर्फ एक बहाना था। असल में उस दिन खेलने का ज्यादा मन कर रहा था, इसलिए स्कूल न जाकर मैदान की तरफ भाग गया था।
लेकिन बाबा को कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने मेरी बात सुने बिना अपने पुराने बेंत (लकड़ी की छड़ी) को उठाया और बोले, "तबियत ठीक नहीं थी, और मैदान में खेल रहा था, है न? अब तुझे मैं ठीक करता हूँ।"
अब अगर आपने किसी सख्त मिजाज गुरुजी के बारे में सुना हो तो आपको पता होगा कि उनका बेंत उठाना ही काफी होता है। पर बाबा की बात अलग थी, वो बेंत उठाते ही सीधे कलाई पर मारते थे। और ये उनके मानने का तरीका था कि “जो नहीं सुनेगा, वो जरूर झेलेगा।”
मुझे दो-तीन बेंत पड़े और आँसू मेरी आँखों से निकल पड़े। लेकिन बाबा के साथ यही बात थी – जितने वो सख्त थे, उतनी ही जल्दी उनका गुस्सा शांत हो जाता था।
जब बाबा ने देखा कि मैं ज्यादा रोने लगा हूँ, तो उन्होंने बेंत नीचे रखा और गहरी साँस लेते हुए बोले, "तू समझता क्यों नहीं है? पढ़ाई बहुत जरूरी है। अगर तू नहीं पढ़ेगा तो जिंदगी में कुछ नहीं करेगा। ये सब खेल-कूद एक समय तक ही ठीक है, लेकिन अगर जिंदगी में कुछ बनना है तो पढ़ाई में ध्यान लगाना पड़ेगा।"
बाबा की बातें सुनते हुए मैं खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था। उनकी बातें कड़वी होती थीं, लेकिन उनके पीछे का मतलब सही था। बाबा का दिल सख्त था, लेकिन इरादे हमेशा नेक होते थे। उन्होंने गाँव के कई बच्चों को अपने सख्त अनुशासन में रखकर पढ़ाया था, और वो सब अब अच्छे पदों पर थे। कोई अध्यापक बना था, तो कोई सरकारी नौकरी में।
बाबा की बातें सुनते-सुनते मुझे समझ आने लगा कि वो मुझे इसलिए मारते थे, क्योंकि वो चाहते थे कि मैं अपनी पढ़ाई पर ध्यान दूँ। बाबा ने मुझे हमेशा सिखाया था कि अगर जिंदगी में कुछ करना है, तो मेहनत करनी होगी।
उस दिन के बाद, मैंने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं स्कूल नहीं छोड़ूंगा।
बाबा की सीख और मेरी बदलती जिंदगी
वो दिन मेरे लिए एक बड़ा सबक था। मैं अब स्कूल जाने लगा और बाबा की हर बात को ध्यान से सुनता था। बाबा का पढ़ाने का तरीका अजीब था – वो बच्चों को एक कोने में खड़ा कर देते थे और कहते थे, "चुपचाप खड़े रहो और जो बोलूँ, उसे रट लो।" यह तरीका सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इसने कई बच्चों को अनुशासन सिखाया था।
मैंने भी बाबा के सख्त नियमों को मानना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मेरी पढ़ाई में सुधार हुआ और मैं अपने क्लास में अच्छा प्रदर्शन करने लगा। अब मैं सिर्फ बाबा के डर से पढ़ाई नहीं कर रहा था, बल्कि खुद को कुछ साबित करने के लिए कर रहा था। बाबा ने मुझे सिखाया था कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बस उसे करने का तरीका सही होना चाहिए।
बाबा के सिखाने का एक और तरीका यह था कि वह हमें गणित के सवाल हल करने के बाद हमेशा कहते थे, "अब ये सवाल ज़िंदगी पर लागू करो। जैसे इस सवाल का हल निकाला, वैसे ही अपनी परेशानियों का हल निकालना सीखो।"
उनकी यह बातें तब तो समझ नहीं आती थीं, लेकिन आज जब मैं बड़ा हो गया हूँ, तो मुझे उनकी कही हर बात का असली मतलब समझ आता है। बाबा हमेशा चाहते थे कि हम खुद सोचें, खुद सीखें और अपने जीवन के फैसले खुद लें।
बाबा के जाने का दुख
वक्त बीतता गया। मैं बड़ा हो गया, लेकिन बाबा की दी हुई सीख मेरे साथ हमेशा रही। एक दिन गाँव में खबर आई कि बाबा बीमार हैं। बाबा की उम्र हो चली थी, और अब उनका शरीर धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा था। गाँव के सभी लोग उन्हें देखने आए। सभी ने उनके पैर छुए और उनसे आशीर्वाद लिया।
मैं भी बाबा से मिलने गया। जब मैं उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "तू अच्छा करेगा।" यह सुनकर मेरी आँखों में आँसू आ गए। बाबा वो शख्स थे जिन्होंने मुझे सही रास्ता दिखाया था, और आज वो मुझे छोड़कर जा रहे थे।
कुछ ही दिनों बाद, बाबा का निधन हो गया। उनके जाने से पूरा गाँव शोक में डूब गया। बाबा के बिना वो गाँव सूना लगने लगा था। उनकी बातें, उनका सख्त अनुशासन, उनका हर काम अब सिर्फ यादों में रह गया था।
बाबा की सीख का असर
बाबा के जाने के बाद, मैंने उनकी हर सीख को अपने जीवन में उतारा। उनकी बताई हुई बातें आज भी मेरे साथ हैं। आज जब मैं किसी मुश्किल में होता हूँ, तो मुझे बाबा की बातें याद आती हैं – “जिस तरह गणित के सवालों का हल निकालते हैं, वैसे ही ज़िंदगी के सवालों का हल भी निकालना पड़ता है।”
बाबा ने मुझे पढ़ाई के साथ-साथ ज़िंदगी जीने का तरीका भी सिखाया। वो हमेशा कहते थे कि अगर मेहनत और अनुशासन होगा, तो कोई भी इंसान किसी भी मुकाम को हासिल कर सकता है।
आज मैं जो भी हूँ, उसमें बाबा का बहुत बड़ा हाथ है। वो मुझे हमेशा याद रहेंगे, और उनकी सीखें मुझे जिंदगी भर प्रेरित करती रहेंगी। बाबा के बिना वो गाँव सूना हो गया, लेकिन उनकी यादें और उनकी शिक्षा हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगी।
यह थी मेरी कहानी – या यूँ कहें, लेखक की कहानी। बाबा का सख्त अनुशासन, उनकी बातें और उनका प्यार मेरे जीवन का आधार बना। उनकी दी हुई शिक्षा मुझे हमेशा इस बात की याद दिलाती है कि ज़िंदगी में अनुशासन और मेहनत से बढ़कर कुछ नहीं है।
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