जंगली बाबा और शरारती लड़के (भाग 3)
जंगली बाबा की उस दिन की धमकी ने गाँव के लड़कों पर गहरा असर डाला। अब वे बाबा के अमरूदों के पास जाने की हिम्मत तो नहीं करते थे, लेकिन शरारत करने की आदत उनके खून में थी। कुछ दिन बाद, उन्होंने फिर एक योजना बनाई—इस बार बिना अमरूद चुराए, केवल मज़ाक करने के इरादे से।
प्रदीप, संदीप और उनके दोस्तों ने सोचा कि अगर बाबा को एक बार और चिढ़ाया जाए, तो देखने में मज़ा आएगा। लेकिन इस बार वे थोड़ा सावधान रहना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बाबा से दूर रहते हुए उन्हें परेशान करने का तरीका खोजा।
रात का समय था, और गाँव में सर्द हवाएं बह रही थीं। गाँव के कोने में बाबा का घर हल्की रोशनी में झलक रहा था। लड़कों ने अपने चेहरे कपड़ों से ढँक लिए, ताकि बाबा उन्हें पहचान न सकें।
"इस बार हम सिर्फ आवाजें निकालेंगे," प्रदीप ने फुसफुसाते हुए कहा। "बाबा को लगता है कि उनका घर शांति में है, लेकिन आज हम उन्हें दिखाते हैं कि असली शैतान कौन है।"
सब लड़के हंस पड़े और घर के पास जाकर झाड़ियों के पीछे छुप गए।
संदीप ने बाबा के घर की ओर देखकर कहा, "चलो, शुरू करते हैं।" उसने अपनी आवाज़ बदलकर किसी बाघ की दहाड़ जैसी निकाली।
"गुर्र्र्र्र..."
बाबा, जो घर के अंदर अपने पुराने बिस्तर पर बैठे थे, यह आवाज़ सुनकर चौंक गए। उनकी आँखें चौड़ी हो गईं, और उन्होंने बाहर देखा, लेकिन उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया।
"कौन है वहाँ?" बाबा ने गुस्से में चिल्लाया।
लड़कों ने हँसते हुए और ज़ोर से आवाज़ें निकालनी शुरू कर दीं—कोई उल्लू की आवाज निकाल रहा था, तो कोई घोड़े की।
अब बाबा को यकीन हो गया था कि कुछ अजीब हो रहा है। उन्होंने जल्दी से अपनी लाठी उठाई और घर के बाहर आ गए। "मैं जानता हूँ कि तुम सब कौन हो! भागने की कोशिश मत करना, तुम पकड़े जाओगे!" उन्होंने आवाज़ लगाई।
परंतु लड़के इस बार सावधान थे। वे झाड़ियों में छुपे रहे और अपनी हंसी रोकने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उन्होंने उम्मीद नहीं की थी।
बाबा की आँखें अचानक झाड़ियों की ओर मुड़ गईं, जहाँ लड़के छुपे हुए थे। उन्होंने अपने पुराने अनुभव और तेज नजरों से अंदाजा लगा लिया कि शैतानी करने वाले लड़के यहीं छिपे हो सकते हैं।
बाबा धीरे-धीरे झाड़ियों की ओर बढ़ने लगे। लड़कों के दिल की धड़कन तेज हो गई। यह एक अजीब सा पल था—क्या बाबा उन्हें पकड़ लेंगे?
संदीप ने फुसफुसाते हुए कहा, "चलो, भाग चलते हैं।"
लेकिन इस बार प्रदीप ने कुछ और सोचा था। उसने अपने दोस्तों से कहा, "नहीं, रुक जाओ। एक आखिरी बार मज़ाक करके भागते हैं।"
जैसे ही बाबा उनके और करीब पहुंचे, प्रदीप ने अचानक ज़ोर से चिल्लाकर कहा, "बाबा, आपका बाग भूतिया हो गया है! अब यहाँ कोई अमरूद नहीं तोड़ सकता!"
यह सुनते ही बाबा ठिठक गए। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाते, लड़के हंसते हुए भाग निकले। बाबा अपनी लाठी उठाकर चिल्लाए, "तुम सबको मैं कभी नहीं छोड़ूंगा! भूत हो या इंसान, इस बार तुम फंसे हो!"
लेकिन इस बार लड़के बहुत तेज भागे और गाँव के अंधेरे में खो गए।
बाबा वहीं खड़े रहे, उनकी लाठी हाथ में थी, और उनकी आँखों में एक अनोखी चमक थी। वह जानते थे कि लड़के मजाक कर रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं उन्हें इस बात की खुशी थी कि गाँव में अब भी शरारत करने वाले लड़कों की हिम्मत थी।
यह तो छोटी सी झलक थी अभी तो बहुत बाकी है आगे चलिए जानते हैं जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी स्टोरी
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